Thursday, May 5, 2011

बेटे के स्कूल का पहला दिन....


आज अक्षत पहली बार स्कूल गया...मुझे और रोली दोनों को पुनाका यानि अक्षत के स्कूल जाने की कल रात से ही बड़ी बेताबी थी.... शायद इसी वजह से मेरी आंखों में नींद रुक रुक कर आ रही थी....क्यों कि मेरा मन नींद से ज्यादा पुनाका के स्कूल जाने के ख्यालों में डूबा हुआ था...आखिरकार किसी तरह रात गुजरी और सहर हुई...खास बात ये है अक्षत के बोलने की शुरुआत के बाद से ऐसा पहली बार हुआ था जब मुझे और रोली को खुद एक्षत ने जगाया..शायद उसमें भी स्कूल जाने की ऐसी मौजें हिलोरे ले रही थीं जिनका अहसास शायद हमें नहीं था....लेकिन वो सबकुछ सुबह अक्षत की बातों में साफ नजर आ रहा था...आज की सहर यानि सुबह मेरे लिए कुछ नई थी...ऐसी सहर जिसकी हवा में मुझे आज नई ताजगी का अहसास हो रहा था...आज इसी हवा को छूकर मेरा अक्षत स्कूल जाने वाला था....मैंने और रोली ने बेहद खुशी खुशी अक्षत को तैयार किया....हालांकि हम उसे पहली बार नहीं तैयार कर रहे थे...लेकिन आज की तैयारी भी रोज से कुछ खास थी । उसकी शर्ट हो या फिर उसकी छोटी सी नीली निकर आज हर कपड़ा पहनाने में खास अहसास था..स्कूल की ड्रेस पहनकर वो तो खुश था ही...हमें भी वो आज रोज से हटकर और दुलारा लग रहा था...मन कर रहा था कि उसे पहले ढेर सारा प्यार करूं और फिर स्कूल लेकर जाऊं.....सारी तैयारी के बाद हम अक्षत को उसकी बस तक छोड़ने के लिए घर से निकले...घर से अक्षत खुशी खुशी पूरे रोमांच के साथ स्कूल के लिए निकला...स्कूल बस के आने से पहले तक वो पूरा बातूनी बन रहा था...लेकिन ठीक सात बजकर पचपन मिनट पर जैसे ही उसकी स्कूल बस आई..अक्षत उसमें जाने के लिए आगे बढ़ा....लेकिन इसी पल उसके चेहरे पर भावुकता के भाव आए ..बस में चढ़ते वक्त अक्षत की आंखों से आंसू तो नहीं टपक रहे थे..लेकिन उसके मासूम दिल का करुण क्रंदन मेरे कलेजे को छलनी कर रहा था...उस समय मैं अपने जहन में दो दो भावों को महसूस कर रहा था...एक मन मेरे बच्चे के जहनी क्रंदन से भावुक था..तो दूसरा मन उसके पहले दिन स्कूल जाने से बेहद खुश था....शायद यही भाव मेरे पापा ने उस वक्त महसूस किए होंगे....जब पहली बार मैं स्कूल गया था।..और यही भाव हर मां बाप महसूस करते होंगे...जब उनका लाडला या लाडली पहली बार स्कूल गया होगा

Saturday, February 12, 2011

ये 'मुबारक' घड़ी बड़ी खास है !




कल शाम को पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी खबर आयी...मिस्र में होश्नी मुबारक के इस्तीफे का ऐलान...मिस्र के उपराष्ट्रपति की आवाज में राष्ट्रपति होश्नी मुबारके के इस्तीफे का ऐलान हुआ...होश्नी के इस्तीफे के बाद पिछले तीस साल से तानाशाही झेल रहे मिस्र में वो मुबारक घड़ी आ गई...जिसका पूरे मिस्र समेत पूरी दुनिया को इंतजार था...जिसके लिए मिस्र के 305 लोगों ने शहादत दी....इसके साथ ही 1981 से चली आ रही होश्नी मुबारक की तानाशाही के खिलाफ पिछले 18 दिनों से चल रही दुनिया की लड़ाई खत्म हो गई... एक ऐसी ऐतिहासिक लड़ाई खत्म हो गई....जिसमें आजतक हारती चली आ रही बेकसूर आवाम ने जीत हासिल की..ये जीत आवाम की है...ये जीत जनतंत्र की है...ये जीत आम इंसान के जज्वे की है...ये जीत मिस्र में नए और सुनहरे भविष्य की है...जो काहिरा के तहरीर चौक पर पिछले 18 दिनों से टकटकी लगाए थी..मैंने खुद अपने चैनल के जरिए मिस्र में मुबारक के सत्ता छोड़ने के बाद की तस्वीरें देखी...और पहली बार ऐसा हुआ था....जब किसी दूसरे देश में हो रहे बड़े परिवर्तन पर मेरे जहन ने खुशी महसूस की थी...मेरे शरीर के रोम रोम ने उठकर इस खुशी का इस्तकबाल किया...काहिरा का तहरीर स्कवॉयर...लोगों की खुशी से फूला नहीं समा रहा था...क्योंकि पिछले 18 दिनों से हिंसक वारदातों के बाद तहरीर ने भी 'मुबारक' और न भूलने वाले नजारे देखे...आम आदमी की खुशी देखी...लोगों की भावनाएं महसूस की..कोई जोर जोर से चिल्लाकर अपनी खुशी बयां कर रहा था...तो किसी की खुशी आंखों से आंसू के रास्ते उतरकर बाहर झलक रही थी..भोली भाली आवाम की इस सबसे बड़ी जीत ने दुनिया के कई हिस्सों में फैली तानाशाही के खिलाफ खतरे की घंटी बजा दी है..मिस्र में हुए तख्तापलट की सकारात्मक आग अब यमन, अल्जीरिया, मोरक्को, सीरिया, जॉर्डन, लीबिया और सउदी अरब सहित की अफ्रीकी और अरब देशों की तानाशाही को झुलसा सकती है....यहां तक की मिस्र में हुए तख्ता पलट से चीन सरकार भी डरी डरी सी नजर आ रही है.. चीन की सरकार ने मिस्र से आ रही बगावत की ख़बरों को दिखाने पर पाबंदी लगा दी थी। यहां तक की चीन में इंटरनेट पर इजिप्ट शब्द को ही ब्लॉक कर दिया है। यमन में भी बगावत के सुर बुलंद हैं...यमन में तीस साल की तानाशाही शासन से परेशान आवाम राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकी है...तो अल्जीरिया में तानाशाही के खिलाफ हुए प्रदर्शन के बाद गृह मंत्री ने राजधानी में प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी है। विकिलीक्स ने खुलासा किया है कि मोरक्को का राजा मोहम्मद vi भ्रष्ट हो चुका है....तो सीरिया में एक ही पार्टी की 48 साल से सरकार है...पूरे सीरिया में भ्रष्टाचार ने कब्जा कर रखा है..मिस्र में जब शासन के खिलाफ विरोध के सुर निकले तो देखा देखी जॉर्डन में भी व्यवस्था में बदलाव को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए...यानि वहां भी लोकतंत्र के लिए तानाशाही के खिलाफ खतरे की घंटी बज चुकी है ...आइये अब आपको बतातें है कि आखिर मिस्र में बगावत की अलख किसने जलाई....कैसे मिस्र की जनता एकाएक तानाशाही की खिलाफत मे उतर आयी...अरब देशों में लोकतंत्र की ये लड़ाई 17 दिसंबर के jasmine Revolution से शुरू हुई.. जिसमें एक शख्स ने ट्यूनीशिया के सिडि बौज़िदी शहर में खुद को आग लगा ली.. जिसके बाद यहां चार हफ्ते तक राष्ट्रपति जैनुल आबेदीन बेन अली की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते रहे...तेईस साल तक ट्यूनीशिया पर शासन करने वाले बेन अली आखिरकार डेढ़ टन सोना लेकर भाग खड़े हुए..ट्यूनीशिया ही वो देश है जिसने तानाशाही के खिलाफ चिंगारी का काम किया...वहां से लोकंतंत्र की हवा के साथ विरोध की चिंगारी यमन से होते हुए मिस्र तक पहुंच गई....जिसने मिस्र में मुबारक इतिहास रच डाला
अब मिस्र की चिंगारी कहां-कहां तानाशाही को जलाकर राख करने वाली है....बस देखते जाइये...कोई हर क्रांति को बस हवा चाहिए...वो मिस्र ने बहा दी है

Sunday, December 19, 2010

Tuesday, November 2, 2010

आओ कुछ नए दीप जलाएं

दीपों का त्यौहार दीपावली...हिंदू धर्म में रौशनी के इस त्यौहार की खासी महत्ता भी है और मान्यता भी.....माना जाता है कि दीपों के इस त्यौहार पर घर आंगन में दीप जलाकर उजियारा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं...और धन धान्य के साथ घर में आती है...जिससे घर में पूरे साल धन वर्षा होती रहती है..सम्पन्नता बनी रहती है।..इस खास मौके पर मां लक्ष्मी को रिझाने और मनाने के लिए,लोग अपनी अपनी तरह से पूजा अर्चना करते हैं...लेकिन इस पूजा अर्चना के दौरान कुछ ऐसा भी होता है..जो शायद बिल्कुल भी नैतिक नहीं होता..ये 'कुछ' है उल्लुओं की बलि...जी हां उल्लुओं की बलि...मेरे ख्याल से आप लोगों में से बहुत ही कम लोगों ने उल्लुओं की बलि के बारे में सुना होगा....लेकिन ये सौ फीसदी सच है कि दीपावली के दिन महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उल्लुओं की बलि दी जाती है...आपको जानकारी होगी कि उल्लू , देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है..मान्यता है कि उल्लू पर सवार होकर ही महालक्ष्मी घरों में प्रवेश करती है..।.दीपावली पर मा लक्ष्मी को मनाने के लिए तंत्र मंत्रों का खासा इस्तेमाल किया जाता है...इस तंत्र मंत्र में अपने स्वार्थ सुलभ करने के लिए मां लक्ष्मी को मनाने के लिए और बहुत सी दूसरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कुछ लोग उल्लुओं की बलि देने जैसा घृणित कार्य भी करते हैं...उनका मानना है कि ऐसा करने से मा लक्ष्मी प्रसन्न होकर घन घानय् की वर्षा करेंगी।...दीपावली पर ऐसे ही घृणित कार्यों के लिए यूपी से दिल्ली ले जाए जा रहे कई तस्करों को पुलिस ने पकड़ा, जो दीपावली पर उल्लुओ को बलि के लिए दिल्ली ले जा रहे थे...लेकिन मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उल्लूखोर तस्करों को धर दबोचा....खास बात ये है कि दीपावली में उल्लुओं की खासी मांग के चलते एक-एक उल्लू की कीमत लाखों में पहुंच जाती है..यू पी से पकड़े गए उल्लुओं में से एक उल्लू तो पूरे ढाई लाख रुपये था..तो बाकी के एक लाख रुपये से ऊपर के। ये सभी उल्लू ऑन डिमांड लोगों को सप्लाई किए जाते हैं जो मोटी रकम देकर बेजुबान उल्लुओं की बलि चढवाते हैं.... लेकिन मेरा सवाल हर किसी आमोखास से है कि क्या कभी किसी बलि से मा प्रसन्न होती हैं...मां को तो ममतामयी माना जाता है....मां हमेशा अपने बच्चों के कल्याण के लिए तत्पर रहती हैं..ऐसे में क्या किसी बेजुबान प्राणी की बलि से मां को प्रसन्नता होगी...क्या कभी किसी को मारने से कुछ हासिल हो सकता है...कम से कम मेरा मानना है नहीं...लेकिन आज भी आजादी के ६ दशक से ज्यादा बीत जाने के बावजूद हमारी सोंच अंधविश्वास की गुलामी से बाहर नहीं निकल पा रही..आखिर क्यों हममें से ज्यादातर लोग उस सडी गली मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं...मौका है खुद विकसित होने का...और विकसित समाज का हिस्सा बनने का..ऐसे में हम को अविकसित और संकुचित सोंच के दायरे से बाहर निकलना होगा....शायद यहीं से देश के विकास में आ रही बाधाओं का खात्मा होना शुरू हो जाएगा..तो आइये इस दिवाली अपनी सोंच को और बेहतर बनाने के लिए दीप जलाएं....ज्ञान के तेल में अपनी सोंच की बाती को डुबोकर समाज के दीपक में खुद को रौशन करें..शायद ये रौशनी बड़ी दूर तक जाएगी। शुभ दीपावली.

Monday, May 10, 2010

मैट्रो है या चारो धाम ससुर !



दिल्ली में मेट्रो अब दिल्लीवासियों की आदत बनती जा रही है...या यूं कहें कि दिल्ली की लाइफ लाइन बनने वाली है....या बन गई है तो गलत नहीं होगा। देशभर के कोने कोने में रहने वाले जब दिल्ली आते हैं तो उनके जहन में एक बात जरूर होती है...कि दिल्ली में मेट्रो में जरूर बैठना है...भई आखिर हम भी तो देखें कि मेट्रो चीज क्या है....कुछ ऐसा ही जज्बा लेकर मेरे एक दोस्त के चाचा यूपी के बलरामपुर से दिल्ली आए...हमारे मित्र भी मेरी तरह एक पत्रकार नामक कीड़ा हैं...एक नंबर के वाचाल हैं...निकल पड़े पहली बार दिल्ली आए अपने चाचा को लेकर दिल्ली भ्रमण पर।...शुरू हुआ चाचा का दिल्ली दर्शन...दिल्ली का एक एक किनारा देखकर चाचा की हैरानी सातवें आसमान की सैर पर निकल पड़ी थी...लाल किले से लेकर कुतुब मीनार...और एमसीडी की सबसे ऊची बिÏल्डग से लेकर जामा मस्जिद तक...सबकुछ देख डाला...इस बीच बारी आई चांदनी चौक से मेट्रो के दीदार और उसकी सवारी की...फिर क्या था...चाचा चल दिए मेरे दोस्त के साथ चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन...स्टेशन के अंदर जैसे ही चाचा घुसे...देखकर दंग....अंदर की पत्थर लगी दीवारें और खूबसूरत नजारा देखकर चाचा के पैर थम गए...आखिर चाचा ने पूछ ही लिया मेरे दोस्त से....अरे भतीजे इ....कहां लै आयो तुम हमका..अरे इस ससुर रेलवे स्टेशन है कि फाइव स्टार होटल...हियां तो बहुत पैसा लागी...बाप रे बाप हम ना जाय पइबे मेट्रो के भित्तर.....चाचा की हैरानी देखकर मेरा खुराफाती मित्र भी बोल पड़ा...अरे चाचा परेशान काहे हौ...हम हन नाही...हम ले चलबै....तुम काहे परेशान हो...चाचा फिर बोले...लेकिन भइया...हिंया तो हम लुट जइबे...हमरे बस की बात नाही है...मेट्रो मा जाइके....लौट चलो.।..इस पर मेरे महाखुराफाती मित्र ने कहा...चाचा आज चाहे जितना पैसा लाग जाए....हम तुमका मेट्रो की सैर कराय के ही दम लेब...आखिर हम कौन बात के भतीजा । जो चाचा का मेट्रो की सैर ना कराय पायी...इस पर चाचा तपाक से बोल पड़े...बेटा जो तुम आज हमका मेट्रो में सैर कराय दिहो...तो हम धन्य हो जाइब..हम का नाज होय जाइ कि तुम हमार भतीजा हो...भइया बड़े दिन से तमन्ना है.।.कि जब दिल्ली जाबै तो मेट्रो मा जरूर बैठब...बड़ा नाम सुना है ससुरी के..।..फिर क्या था मेरे मित्र ने मेट्रो टिकट विंडो से मेट्रो टोकन खरीदे...उनमें से एक चाचा को पकड़ा दिया...और कहा कि चाचा इ प्लास्टिक का टिकट है...बड़ा कमाल का है...जैसे इ पल्ला यानि दरवाजे के पास कोने पर छुवइहौ ...भन्न से दरवाजा खुल जाइ...और जैसे दरवाजा खुले...जोर से भागेव...नहीं तो पीछेन रहि जइहौ....मेट्रो स्टेशन के अंदर हर बात से हैरान चाचा ने मेट्रो टोकन गेट के पास जैसे ही टोकेन टच किया..गेट खुल गया..फिर क्या था चाचा इतनी जोर से भागे मानो भूत ने दौडा लिया...उसके बाद बारी आई एस्केलेटर यानि चलित सीढ़ियों की...गांव के सीधे साधे चाचा को जब उस पर चलने के लिए मेरे दोस्त ने कहा कि तो चाचा खासे डर गए...चाचा ने कहा..भइया हम तो गिरेन जाइबे...मुंह टूट जाइ..लेकिन जैसे तैसे दोस्त ने चाचा को एस्केलेटर पर चढ़ाया ...उसके बाद तो चाचा के अचरज का ठिकाना ही नहीं रहा...चाचा वाह वाह करने लगे...वाह भइया ..इ तो सार बिल्कुल पुष्पक बिमान होय रहा है....मजा आय गवा....खड़े हो जाव, खुदै पहुंचाय दी ऊपर...चाचा की इस हरकत पर अगल बगल चल रहे लोग मुस्की काट रहे थे...एस्केलेटर से उतरते समय चाचा ने बड़ी जल्दी दिखाई...उसके बाद बारी आई मेट्रो पर बैठने की...अभी तक मेट्रो नहीं आई थी...लेकिन अंदर का नजारा देखकर....चाचा का दिल बाग बाग हो चुका था....चाचा हर चीज को देखकर दोस्त से सवाल करने में जुटे थे...और वो उसी अंदाज में चाचा के सवालों के जवाब दे रहा था। तब तक मेट्रो भी आ गई....मेट्रो के दरवाजे खुले...और भीड़ बाहर की ओर निकली...और बाहर खड़ लोग अंदर की ओर...उसके बाद दरवाजा बंद हो गया..ये नजारा देख चाचा का चेहरा रोमांचित हो गया..चाचा ने कहा...वाह भइया वाह...का गजब चीज बनाइन हैं भगवान...खुदै खुल जात है और खुदै खट्ट से बंद हो जात है...अगर चूक गयो तो बाहरै रहि जाओ...बेटा तुमरी चाची के साथ तो इन्हां नाय आवै वाला है...पता चलै कि उ अंदर रहि गर्इं...और हम बाहर...या हम अंदर और उ बाहर...फिर तो गजबै हो जाई...रोमांच का ये दौर यूं ही जारी था...मेट्रो सुरंग के अंदर चल रही थी...और चाचा ये सबकुछ देखकर हतप्रभ थे..हैरान थे...मेट्रो में हो रही उद्घोषणा सुनकर भी चाचा सकपका गए...अरे सार गजबै है....सबकुछ बोलत है मशीन...कहां पहुंचेव...और जस कहत है दरवाजा खुल जात है....इन सबके बीच मेट्रो राजीव स्टेशन पहुंची जहां से चाचा के साथ मेरा दोस्त बाहर निकला...इस दौरान भी चाचा चौंके चौंके नजर आए...लेकिन उनके चेहरे पर एक अनोखी मुस्कान थी..चाचा मन ही मन प्रसन्न थे...बाहर निकलने के बाद चाचा ने मेरे दोस्त से कहा...कि बेटा मेट्रो मा यात्रा कर ऐसा लगा...मानौ तुम हमका चारो धाम की यात्रा कराए दिहौ....हम तो सार अपने जनम मा मेट्रो मा यात्रा ना कर पाइत...लड़िका हो तो तुमरे जस...जुग जुग जियो बेटा....उधर चाचा की बातों पर मेरे पत्रकार मित्र कुटिल मुसकी काट रहे थे...और मन ही मन सोच रहे थे..वाह रे चाचा...मजा आ गया आपके साथ घूम के...आपने दिल्ली देखी...और मैंने आपको.। लेकिन चाचा को घुमाकर मेरे दोस्त भी खुश नजर आए..दिल्ली से जब चाचा वापस बलराम पुर गए...तो अपने गांव में उन्होंने मेट्रो के गुणों के ऐसे पुलिंदे लोगों के सामने बांधे किए...कि लोग दंग रह गए...वो पुलिंदे हम आपको अपनी इसी कहानी की अगली किश्त में पढ़ने के लिए परोसेंगे...ये सारी कहानी मेरे मित्र ने मेरे घर पर सुनायी थी...जो मुझे अच्छी लगी और मैंने आप लोगों के लिए शब्दों में पिरोने की कोशिश की।

Thursday, March 18, 2010

बीजेपी में नया विद्रोह....


बीजेपी की नई टीम पर तीन महीने तक चुप्पी साधने के बाद नितिन गडकरी ने पदाधिकारियों और समितियों का ऐलान किया तो...अब पार्टी में भूचाल सा आ गया है.....पार्टी अध्यक्ष को अपने इस पहले ही मोर्चे पर जोरदार झटका लगा है::::दो दिन पहले ही बनाई गई उनकी नई ब्रिागेड को लेकर असंतोष के बादल मंडराने लगे हैं..नई टीम को लेकर बिहार से महाराष्ट्र.... और कर्नाटक से उत्तराखंड तक, हर ओर असंतोष दिखाई दे रहा है...पार्टी के कई दिग्गज भी नई टीम के स्वरूप से खासे नाराज हैं...... शाहनवाज हुसैन नई टीम के साथ पार्टी प्रवक्ता बनने को तैयार नहीं हैं.....तो शत्रुघ्न सिन्हा ने इस सवाल पर जमकर अपनी भड़ास निकाली है.... उधर हर्षवर्धन, बीसी खंडूरी के अलावा सीपी ठाकुर और राजीव प्रताप रूड़ी जैसे बड़े और कद्दावर नेता भी..... नई टीम में महत्वपूर्ण लोगों को नजरअंदाज करने से नाराज हैं....शत्रुघ्न सिन्हा ने तो साफ कहा है कि पार्टी में कई वरिष्ठ और योग्य नेता हैं जिन्हें नई टीम में जगह नहीं दी गई....बिहारी बाबू ने कहा कि वो नई टीम से काफी दुखी हैं..इस बीच पता चला है कि ....महाराष्ट्र को प्रमुखता देने की शिकायत दूर करने के लिए बिहार के दो नेताओं राधामोहन सिंह और नंदकिशोर यादव को भी जल्द ही नई टीम में जगह मिलने की उम्मीद है....फिर महाराष्ट्र जैसे राज्य से अट्ठाईस नेता भले ही टीम में हैं....लेकिन गोपीनाथ मुंडे अभी भी अपने समर्थकों के छूट जाने से नाराज हैं...मुंबई से प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन को ना लेना भी बीजेपी के केंद्रीय नेताओं को अखरा है........ टीम में रविशंकर प्रसाद को महासचिव के साथ मुख्य प्रवक्ता बनाया जाना भी बहुत से नेताओं को रास नहीं आ रहा...राजीव प्रताप रूढ़ी भी अपने पद से संतुष्ट नहीं हैं..कुल मिलाकर नई टीम को इसी रूप में चलाना गडकरी के लिए विद्रोहियों की टीम चलाने जैसा है...वो भी ऐसे समय में जब पार्टी देश के कई प्रदेशों में लगातार अपना जनाधार खोती जा रही है:::पार्टी के सुप्रीम सदस्यों की ये नाराजगी गडकरी को भारी पड़ सकती है.....खबर ये भी है कि गडकरी ने अपने कई वरिष्ठ सहयोगियों से बिना राय मशविरा किए ही अपनी नई नीट का ऐलान कर डाला...ऐसे में अगर गडकरी अपनी नई टीम से उपजे असंतोष को दूर करना चाहते हैं...तो उन्हें टीम में फेरबदल करने पड़ सकते हैं...ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ साथ पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं और सदस्यों की क्षमता के मुताबिक नई ब्रिागेड में साथियों को शामिल करना चाहिए...और अगर ऐसा नहीं हुआ..तो एक केंद्रीय पार्टी को अपने ही पार्टी के विद्वेश रूपी कीड़े खोखला कर सकते हैं...जो बीजेपी के लिए एक नई मुसीबत बन सकती है...इसलिए गडकरी को सोच समझकर और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप निर्णय लेने पड़ेंगे..तभी एक बड़ी पार्टी की नाव ठीक से खे पाएंगे।

Saturday, February 6, 2010

आतंकियों का खौफनाक रोजगार-स्टोन पेÏल्टग

पत्थरों के जरिए गुस्से का इजहार....कश्मीर घाटी में काफी समय से अपना विरोध जताने का ये तरीका कुछ ज्यादा ही आम हो चला है....जी हां मामला किसी भी स्तर का हो...विरोध जताने के लिए पत्थर चलाना बेहद जरूरी हो गया है घाटी में...जानते हैं क्यों...इसलिए नहीं कि ये इन पत्थरों के जरिए अपने गुस्से का इजहार करना चाहते हैं....बल्कि इसलिए क्योंकि इनके हाथों फेंका गया एक एक पत्थर इनकी कमाई में इजाफा करेगा....इन्हें अगली बार इस तरह का रोजगार दिलाने में और ज्यादा मददगार साबित होगा....ये फेंका गया पत्थर....ऐसे में उपद्रव के दौरान फेंका गया हर पत्थर बेसकीमती कहा जा सकता है...हर पत्थर उपद्रवियों की जेब गरम कर रहा है....और इसीलिए आप पिछले डेढ़ साल की घटनाओं पर नजर डालें तो ज्यादातर विरोध प्रदर्शनों के दौरान स्टोन पेÏल्टग यानि पत्थर फेंकना आम बात रही है...लेकिन क्यों क्या बिना पत्थर फेंके विरोध प्रदर्शन सफल नहीं हो सकता...सफल हो सकता है लेकिन बस कुछ लोगों के लिए....लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं उपद्रवियों की भीड़ में जिनका सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद होता है....ज्यादा से ज्यादा स्टोन पेÏल्टग....वो जितने ज्यादा पत्थर सुरक्षाबलों पुलिसकर्मियों पर चलाएंगे...उसी के मुताबिक उन्हे मेहनताना दिया जाएगा.......जी हां, आप सोच रहे होंगे...हम ये क्या कह रहे हैं।...लेकिन ये बिल्कुल सच है...कश्मीर घाटी में बहुत से लोगों के लिए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्थर फेंकना रोजगार बन चुका है..जितना ज्यादा मेहनताना...उतने ज्यादा पत्थर,ज्यादा लोगों को घायल करने के लिए और ज्यादा पारिश्रमिक...बात हैरान कर देने वाली जरूर है....लेकिन है हकीकत से लबरेज..इन दिनों घाटी के बेरोजगार युवकों के लिए ये एक बड़ा और चोखा धंधा बना हुआ है...यानि हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चोखा.. ..युवाओं को ये घिनौना रोजगार मुहैया करा रहे हैं कुछ आतंकी संगठन...जिसमें लश्कर ए तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन भी शामिल हैं...अपने घिनौने और खौफनाक मकसद को अंजाम देने के लिए अब दहशतपसंद लोगों ने इसे धंधा बना दिया है....हर साल आतंकी संगठन लाखों रुपये इस पत्थर फेंकने के धंधे पर खर्च करते हैं...ये सनसनीखेज खुलासा किया है जम्मू कश्मीर की पुलिस ने ..पुलिस ने ऐसे ही पत्थर फेंकने वाले गिरोह के सरगना को गिरफ्तार किया है...उसके पास से बड़ी संख्या में जाली दस्तावेज अहम जगहों के नक्शे और नकली पहचान पत्र भी बरामद किए गए हैं। पकड़े गए आरोपित के मुताबिक आतंकी संगठनों ने पथराव के काम को बेहतर तरीके से अंजाम देने के लिए अलग अलग ग्रुप बना रखे हैं....इन समूहों को उनके काम के हिसाब से मोटी रकम दी जाती है...यानि काम जितना बेहतर और असरदार होगा....मेहनताना भी उतना शानदार होगा...ये समूह प्रदर्शनों के दौरान स्थानीय बेरोजगारों को आगे कर उनसे पथराव कराते हैं...और उसके बाद तयशुदा समय पर उनका भुगतान किया जाता है।..इस सनसनीखेज खुलासे के बाद सरकार इन पत्थरबाजों पर लगाम कसने की तैयारी कर रही है।....लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर इतने लंबे समय से ये घिनौना खेल घाटी में खेला जा रहा है...और सरकार और खुफिया तंत्र को इसकी भनक इतनी देर से क्यों लगी...क्यों दहशतगर्द अपनी गंदी हरकतों की सीढ़ियां चढ़ने में सफल हो जाते हैं....इस पर गहन सोच विचार की जरूरत है....दहशत गर्दों के इस तरह के नापाक मंसूबों से अब देश के हर नागरिक को सचेत रहने की जरूरत है....क्यों कि हमारे दुश्मन और दहशतपंसद चंद लोग ये नहीं चाहते कि देश में अमन और चैन कायम रह सके...और इसी लिए अमन और चैन में खलल डालने के लिए वो नित नई धूर्त साजिशें रचते रहते हैं....स्टोन पेÏल्टग भी उन धूर्तों की एक बानगी भर है....इसीलिए जरूरी है हर भारतवासी को सचेत होने की ...कि देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वालों के साथ समझौता नहीं करेंगे...बल्कि देश की ओर उठने वाली हर गलत निगाह को नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा...इसे पढ़कर अगर आपके मन में भी कुछ खयाल पनप रहे हैं तो यहां बोलिए....

Friday, January 1, 2010

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

सभी ब्लॉगर्स को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.....ई·ार करे....नए साल पर आप लोग और ज्यादा ब्लगियाएं...और अपनी बात और बेहतर ढंग से लोगों तक पहुंचाए....अरविंद शुक्ल

तिवारी जी ये क्या हुआ?


एनडी तिवारी....एक लंबी राजनीतिक पारी का अनुभव रखने वाला एक शख्स....जिसके सार्वजनिक जीवन पर जिंदगी के आखिरी पड़ाव में दाग लग गया....एक ऐसा दाग जो भले ही सही ना हो ....उसके निशान छुटाने से भी अब नहीं छूटेंगे....लेकिन अफसोस होता है....स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर गांधी जी के साथ का अनुभव और उसके बाद देश के विकास में योगदान देने वाले की ऐसी विदाई....परेशान करती है....ये अलग बात है कि नारायण दत्त तिवारी आज भी इस दंश को अपने राजनीतिक जीवन से विदाई नहीं मानते..सत्तासी साल की ये राजनीतिक शख्सियत अभी भी अपनी पारी खेलने के प्रति आ·ास्त है....उन्हें लगता है....कि इससे उनके लंबे और अनुभव जीवन पर कोई आंच नहीं आएगी...हैदराबाद में अपना इस्तीफा देने के बाद वो देहरादून पहुंचे.... जहां उनके समर्थक फूल मालाएं लेकर उनके सम्मान में खड़े थे...चारो तरफ से एक ही नारा हवाओं में था...कि तिवारी तुम संघर्ष करो हम तुमहारे साथ हैं....वहीं कुछ महिलाओं और संगठनों ने एयरपोर्ट के बाहर उनके खिलाफ नारे भी लगाए...और उनका पुतला भी फूंका...इन दोनों ही नजारों की जानकारी तिवारी जी को थी....लेकिन एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय उनके चेहरे पर अपने ऊपर लगाए गए आरापों की शिकन और तल्खियां नजर नहीं आ रही थीं...ना ही ऐसा लग रहा था कि उन्हें कोई पछतावा है...देहरादून में उन्होंने इस पूरे मामले को अपने खिलाफ साजिश बताया..और इसके पीछे कई तरह की बातें बताई....उन्होंने कहा कि अच्छा ही हुआ....इस उम्र में आंध्रा की परेशानियां मुझसे झेली नहीं जातीं...वहां अगल राज्यों को लेकर कई आंदोलन चल रहे हैं...और उनमें से फिलहाल सबसे प्रभावी तेलंगाना मुद्दे पर मुझपर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही थी....इसके अलावा लोग राजभवन से कई तरह के निजी फायदे भी चाहते थे....जिसके लिए मुझपर लगातार दबाव बनाया जा रहा था...लेकिन राजभवन की अपनी गरिमा है...उसके साथ मैं खिलवाड़ नहीं कर सकता...और इसीलिए मैं वहां से खुद ही आना चाहता था....इस्तीफा देने के सवाल पर तिवारी जी ने कहा कि उन्होंने सेक्स स्कैंडल के आने से पहले ही केंद्र को अपना त्यागपत्र दे दिया था...सवाल ये उठता है कि अगर ऐसा था...तो तिवारी जी वहां से पहले ही क्यों नहीं आ गए...सेक्स स्कैंडल में नाम उछलने के बाद ही वहां से वापस क्यों आए...इतना बड़ा आरोप लगने के सवाल से भी तिवारी जी खुद को बेहतर तरीके से बचाते नजर आए...उन्होंने कहा कि लोगों ने तो गांधी जी जैसी महान हस्ती को भी नहीं छोड़ा..हम तो कुछ भी नहीं हैं। क्या तिवारी जी की बातें सही हैं...या फिर आरोपों में सच्चाई है....ये तो तिवारी जी से बेहतर कोई भी नहीं जानता...लेकिन सवाल ये भी है कि बार बार तिवारी जी पर एक ही तरह के आरोपों क्यों लगते रहे हैं...ऐसा उनके समकक्ष और उनके राजनीतिक कद के बराबर की दूसरी शख्सियत के साथ देखने को क्यों नहीं मिलता...इसका जवाब भी तिवारी जी से बेहतर भला कौन दे पाएगा। काश उनके गरिमामयी सफर के साथ आजकल का ये मामला ना जुड़ा होता...तो शायद बेहतर ही होता....क्योंकि ऐसे बोझ रूपी आरोप ...चाहे वो सही हों या फिर गलत...जब तक जिंदगी रहती है....सालते ही रहते हैं....और तिवारी जी को चुभाए गए ये आरोप रुपी कांटे सिर्फ उन्हें ही नहीं उनके प्रशंसकों को हमेशा चुभते रहेंगे....और उनके लंबे अनुभवी सामाजिक जीवन पर सवाल उठाती रहेगी।इस पर अगर आप कुछ बोलना चाहें....तो जरूर बोलिए....

Tuesday, December 15, 2009

एक तीर से दो निशाने !

तेलंगाना मसले पर हामी भरने के बाद केंद्र सरकार की पेशानी पर बल पड़ने लगे थे....लेकिन तेलंगाना समर्थकों का नया बयान केंद्र सरकार के लिए मरहम बनकर आया है....जो परमानेंट ना सही....लेकिन फिलहाल सरकार को राहत पहुंचाने काम तो करेगा ही...तेलंगाना समर्थकों यानि टीआरएस के नेताओं ने कहा है कि वो दो हजार चौदह तक तेलंगाना नाम से अलग राज्य के लिए इंतजार कर सकते हैं....टीआरएस नेताओं का तर्क है कि चूंकि कांग्रेस ने अलग तेलंगाना राज्य पर सहमति जता दी है...इसलिए टीआरएस अब इस मसले को और ज्यादा तूल नहीं देना चाहती ....लेकिन क्यों...इस बीच ऐसा क्या हो गया....जो ये मसला फिलहाल शांत होता नजर आ रहा है....कहीं इसमें टीआरएस की कोई सोची समझी गणित तो नहीं है....जिसकी बिसात पर वो केंद्र सरकार को बिठाने के मूड में है...तेलंगाना समर्थकों ने ये कहकर फिलहाल आंदोलन टाल दिया है..कि जब केंद्र सरकार ने सहमति दे दी है...तो फिर अब उत्पात मचाने से क्या फायदा...लेकिन अगर आप देखिए....तो लगता है....कि हामी भरवाने के बाद की गई इस घोषणा से अब टीआरएस एक तरफ तो केंद्र पर अपना दबाव बरकरार रखना चाहती है....तो दूसरी ओर खुद आंध्र प्रदेश में अपनी स्थिति और मजबूत करने की मोहलत लेना चाहती है....क्यों कि टीआरएस को मालूम है कि जिस समय आंदोलनों का दौर चल रहा था...तेलंगाना का विरोध करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी....जिनके जहन में अभी भी तेलंगाना के खिलाफ आग भड़की हुई है....कहीं दो हजार चौदह की बात कह कर टीआरएस अपना कुनबा और मजबूत करने की कवायद तो नहीं करने जा रही ..क्योंकि मौजूदा समय में भी उसके पास प्रदेश में बहुत ज्यादा सीटें तो हैं नहीं...और टीआरएस ये बात अच्छी तरह जानती है कि सीटों की मजबूती ही तेलंगाना के समर्थन को और बल दिला सकती है....जो फिलहाल उसके पास नहीं है..दूसरी ओर दो हजार चौदह में विधानसभा चुनाव हैं....सो फिलहाल वो होमवर्क करने के मूड में है ये कहा जाए...तो शायद गलत नहीं होगा....क्योंकि एक बात तो शायद आप भी अच्छी तरह जानते हैं जो कि इतिहासकरों ने दिल खोलकर कही है....कि प्रशासकों को लेकर जनता की याददाश्त बेहद कमजोर होती है...कहने का तात्पर्य ये है कि क्या पता अगर टीआरएस दो हजार चौदह में ज्यादा सीटें ले आए.....जिसके बाद तेलंगाना की मांग को और पुख्ता ढंग से रखा जा सकता है...एक बात और, जो सामने है कि टीआरएस के नेता इस बात को भलीभांति जानते है कि केंद्र के लिए तेलंगाना राज्य बनाना इतना आसान नहीं है....क्यों कि उसका अनुसरण करते कई और लोग मुंह खोले दूसरे नए राज्यों की मांग के साथ तैयार हैं....तेलंगाना के बाद उनका स्वर चरम पर पहुंच जाएगा...जो सरकार के लिए नासूर जैसा साबित हो सकता है।.....ऐसे में फिलहाल जहां तेलंगाना समर्थक खुद होमवर्क के मूड में हैं....तो दूसरी ओर वो केंद्र सरकार को भी फिलहाल चिंतामुक्त कर आगे के लिए उनको तैयार करना चाहते हैं...अब आगे क्या होगा...कांग्रेस दो हजार चौदह में इस पर क्या करेगी...ये तो तब की तब देखी जाएगी...लेकिन दूसरी ओर टीआरएस ने केंद्र को नए राज्यों की मांग कर रहे लोगों को फिलहाल खामोश करने की चाबी जरूर थमा दी है।

Tuesday, December 8, 2009

दो सिर वाला लड़का !

अभी दो तीन दिन पहले की बात है..मुझे एक स्पेशल पैकेज लिखने के लिए कहा गया...स्लग था... दो सिर वाला लड़का....आप के लिए भी थोड़ा बहुत तो अजीबोगरीब होगा ये लड़का....ये लड़का बिहार के दरभंगा में लगे एक मेले में आया था...जहां उसे देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुट रही थी....खास बात ये है ुइसके लिए लोगों को टिकट लेना पड़ रहा था...मतलब की लड़का नुमाइश का सामान बनकर वहां आया था...उसे देखने वाले लोग भी उसे देखकर अपनी हैरानी प्रकट कर रहे थे..जहां लोगों उसे देखकर हैरानी हो रही थी...वहीं तरस भी आ रहा था. कि वो बेचारा कैसे रहता होगा..कैसे उसकी दिनचर्या कटती होगी...लोग आते और देखकर चले जाते...इस बात की खबर हमारे पत्रकार भाइयों को लगी...उन्होंने उसको कहानी बनाकर चैनल और अखबार में परोसने की ठानी...सो पहुंच गए कैमरा और कागज, कलम लेकर...दो सिर वाले अजूबे लड़के से बात की और उसको मेले में लाने वाले से भी बात की...हो गई स्टोरी तैयार..फिर भेज दी गई अपने अपने ऑफिसेज में...चैनल और अखबार के दफ्तरों में...चैनलों ने इस स्टोरी को बखूबी परोसने की कोशिश की....हेडर चलाए...शर्मसार हुई मानवता/ दो सिर वाला लड़का देखो/नुमाइश का सामान बना लड़का/क्या सही है नुमाइश?/ कुदरत का अनोखा खेल...कुछ इसी तरह के हेडर के जरिए स्टोरी को व्यूवर्स के सामने परोसा गया...अधिकारियों से बात-चीत दिखाई गई....कुल मिलाकर लुब्बोलुवाब ये रहा कि....मीडिया में इस खबर को इन नजरिए से पेश किया गया कि जिस लड़के को सहानुभूति मिलनी चाहिए...जिसे सही इलाज की जरूरत है....देखभाल की जरूरत है...उसे तिजारत का सामान बनाकर नुमाइश में बैठा दिया गया है....और मैं भी और शायद आप भी इस बात को गलत ही मानेंगे...कि उस लड़के साथ गलत हो रहा है....इस बारे में अधिकारियों ने चैनलों और अखबार पर खबर आने के बाद जांच का आ·ाासन दे दिया...कि जो भी कुछ हो रहा है वो गलत है...।ये तो था पहला पहलू...उसके बाद दूसरा पहलू देखिए....जो चैनलों और अखबार के दफ्तरों में मुझे देखने को मिला...अच्छी रही स्टोरी....खूब बिकी....लोगों ने खूब देखा...जैसी बातें हो रही थीं दो सिर वाले उस लड़के की स्टोरी के बारे में...बस हो गया अपना काम पूरा....अब मैं जो कहना चाहता हूं उस पर आता हूं....अपने खुद इस स्टोरी को लिखा था...और ऑन एयर कराया था...जिसके बाद मेरे मन में कई तरह के सवाल सामने आ रहे थे...कि क्या बस हमारा फर्ज पूरा हो गया...जिस लड़के की स्टोरी हमने दिखाई....उसके बारे में हमारे कर्तव्य क्या पूरे हो गए...जो शख्स उस बच्चे को नुमाइश में लाया था...हमने स्टोरी में उसकी खूब खिंचाई की थी...कि उसने गलत किया ये सही नहीं है...उसने मानवता को शर्मसार किया....किसी की मजबूरी को पैसे कमाने का जरिया बना दिया...लेकिन आप जानते हैं उस शख्स ने उस बच्चे को एक अनाथ आश्रम से गोद लिया था..क्योंकि दो सिर हाने की वजह से उसके अपने मां बाप ही उसे छोड़कर चले गए थे...मान लीजिए वो उसी अनाथ आत्रम में ही रह जाता ...तो तब क्या होता....क्या कोई आम इंसान, बेऔलाद दंपति उस बच्चे को अपने घर ले जाता....शायद नहीं....फिर क्या करता वो बच्चा..मीडिया को लोगों की पीड़ा को सामने लाने और उसे दूर करने वाला ....की नजर से लोग देखते हैं...लेकिन क्या हकीकत में हर जगह मीडिया ऐसा करती है...अब जब मामला मीडिया में पहुंच गया...तब से लेकर आज तक उस दो सिर वाले लड़के के बारे में मीडिया ने क्या किया....बस खबर चलाकर इतिश्री कर ली...अब कोई पूछने वाला भी नहीं है उस बच्चे को....कि कहां गया वो...अगर उसके मालिक ने उसे इस काम से अलग कर भी दिया....तो उसका पेट कौन भरेगा....मीडिया में आई खबरें...या हमारी आपकी संवेदनाएं....हो सकता है इस मामले में मै थोडा भावुक हो गया हूं...लेकिन क्या ये सच नहीं है...मेले से हटाए जाने के बाद उस शख्स को अपनी जीविका का दूसरा साधन भी ढूंढना पड़ेगा...जो कि बहुत आसान नहीं होगा..ऐसे में जब वो लड़का उसके काम का नहीं है...तो वो भला कब तक उसकी देखभाल कर पाएगा इस दुनियां में... ऐसी दुनिया में जहां लोग अपने ही मां बाप को बुढौती में छोड़ने से नहीं हिचकिचाते...मैं कहना ये चाहता हूं..कि जब मुद्दा उठाया गया हो....तो उसे अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश भी हम लोगों को करनी चाहिए...क्यों ताकि मीडिया सिर्फ खबरों को उछालने का एक माध्यम ना कहा जाए....बल्कि लोगों की जिंदगी में खुशहाली लाने का जरिया भी माना जाए....इस नजरिए कि पहल हमें ही करनी होगी...शायद हमारी आपकी कोशिशों और पहल से इस तरह की जिंदगी जीने वालों की दुनिया रौशन हो जाए

Wednesday, November 25, 2009

मलाल......

बात उन दिनों की है जब मैं रिपोर्टिंग में था....खबर मिली कि नोएडा के रजनीगंधा चौक के पास से एक मोटरसाइकिल सवार का कार में सवार लोगों ने अपहरण कर लिया....मैं फौरन अपने कैमरामैन के साथ स्पॉट पर पहुंच गया....लेकिन वहां कुछ नहीं था...चौराहे पर ही कोने में पुलिस चौकी है....सो जानकारी के लिए वहां पहुंचा...वहां भी काफी देर तक तो कोई पुलिसकर्मी नजर नहीं आया...फिर एक जनाब नजर आए तो उन्होंने बताया कि अपह्मत युवक की मोटरसाइकिल पीछे खड़ी है...और इसके अलावा फिलहाल अपने पास कोई जानकारी नहीं है...अपने सूत्रों से जानकारी की..तो पता चला कि मोटरसाइकिल गाजियाबाद के किसी शख्स की है..लेकिन उसने गाड़ी छह महीने पहले नोएडा के एक सज्जन को बेच दी थी...फिर क्या था उन सज्जन का नाम पता खंगाला गया...पता चला कि जनाब सेक्टर सत्ताईस के एक मकान में रहते हैं...फिर क्या था फौरन हम लोग उनके मकान की ओर दौड़े...भई आखिर टीआरपी का खेल है...सो सबसे पहले विजुअल बटोरने की होड़ तो थी ही...और मैं किसी से पीछे कैसे रह सकता था...पहुंचे अपह्मत हुए भाई साहब के घर...उनकी पत्नी को तबतक जानकारी नहीं थी...हम लोगों ने बताया तो...मानों घर में भूचाल आ गया हो...दहाड़ मार मार कर रोने लगी वों...और बात भी कुछ ऐसी ही थी..हम लोगों ने उनको ढांढस बंधाया...और फिर उनसे जानकारी ली..पता चला कि उनके पड़ोस के ही रहने वाले एक नामचीन शख्स से उनकी मकान को लेकर झगड़ा चल रहा है...वो उन्होंने उन्हीं नामचीन पर अपना शक जाहिर कर दिया...फिर क्या था हम लोग पहुंचे....उन नामचीन सज्जन के यहां...जहां वो अपनी पत्नी के साथ बैठे हुए थे...हम कुछ पूछते तबतक पुलिस भी आ गई..सो उनसे कुछ पूछने का मौका नहीं मिला...हां इतना जरूर था कि कैमरामैन ने पुलिस और उक्त नामचीन शख्स के विजुअल जरूर बना लिए थे...फिर हम पहुंचे...थाना बीस जहां हमनें उन नामचीन की बाइट लेनी चाहिए...लेकिन उन्हें नाराजगी जाहिर करते हुए बाइट देने से इनकार कर दिया...हमें क्या था हम तो अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित थे ही ...उठाई लेखनी और लिख डाला एक शानदार पैकेज झ्र् दो पक्षों बाइट वाली कहानी ट ...हालांकि इसमें दूसरे पक्ष की बाइट नहीं मिली थी....और कैमरामैन को विजुअल्स की लॉग सीट यानि दृश्य विवरणिका तैयार करने के लिए कहा...अभी हम चैनल को खबर भेज भी ना पाए थे...कि खबर मिली कि अपह्मत हुए युवक के मिलने की खबर मिली...हम भागे भागे थाना बीस पहुंचे ...जहां एसएसपी इस मामले में पीसी कर रहे थे...हमने भी देखा अपह्मत युवक को...उन्होंने बताया कि उनके मुहल्ले में रहने वाले उसी नामचीन शख्स ने उनका अपहरण कराया था।...खैर हमने एक और खबर पैक की...और भेज दिया अपने चैनल में...खबर चल गई...मैं खबर चलवाकर भूल गया कि ऐसा कुछ हुआ था...दो दिन बाद की बात हैं मैं एक चौहारे पर कोई कवरेज कर रहा था...उसी दौरान मेरे पास एक फोन आया...एक महिला रो बिलख रही थी...और मुझसे पूछ रही थी कि क्या आप ईटीवी से हैं...मैंने जवाब दिया हां...फिर क्या था फोन पर ही उन महिला ने आंसुओं का समंदर बहा दिया...इस समंदर में एक क्षण को मैं भी डूबने लगा था...लेकिन मैंने खुद को संभाला और उनकी बात सुनी...वो बता रही थीं...कि उनके पति को पुलिस ने फर्जी मामले में फंसा दिया है...जानते हैं ये वही मामला था....जिसमें सेक्टर सत्ताईस में रहने वाले युवक की धर्मपत्नी ने उनके ही सेक्टर में रहने वाले नामचीन शख्स पर अपहरण का आरोप लगाया था...मैंने उन महिला की बात सुनी...वो उन्हीं नामचीन की पत्नी थीं....और सिसककर रो रही थीं...उन्होंने मुझे बताया कि पुलिस ने उनके पति के खिलाफ झूठा मामला बनाया है...इतना ही नहीं रिपोर्ट में पुलिस ने उनके पति को गाजियाबाद के जंगलों से गिरफ्तार करने की बात कही थी...जबकि हकीकत में उन्हें पुलिस हमारे सामने घर से ले गई थी...वो मुझसे आग्रह कर रही थीं...कि मैं उन्हें घटना वाले दिन के विजुअल्स मैं उन्हें उपलब्ध करा दूं....आपको जानकारी दे दूं...कि उनके घर में मियां बीवी के अलावा कोई नहीं था...मेरा मतलब उनके बच्चे नहीं थे...ऐसे में वो महिला बेचारी किन हालात से गुजर रही थीं..कि अंदाजा शायद आप लगा सकते हैं...उम्र के ढलते पढ़ाव में एक महिला का एक मात्र साथी जेल चला जाए..तो उसके दिल पर क्या गुजर रही होगी...मैंने उनकी बात सुनी और फिर उन्हें एक आ·ाासन देकर फोन रख दिया...हालांकि आ·ाासन देना मेरे डेली रूटीन में था...और मैं फिर अपने काम में जुट गया..थका हारा घर पहुंचा...लेकिन उस महिला की बातें मेरे जहन से निकलने का नाम नहीं ले रही थीं...मैं अतंरद्वंद में पड़ा था...समझ नहीं पा रहा था कि क्या करू...पुलिस की इस हरकत पर मुझे बड़ा क्रोध आ रहा था....लेकिन चुप था..एक बात और जिन जनाब का अपहरण हो गया था...उन्होंने भी पुलिस के सामने बयान दिया था कि वो शख्स उन्हें साथ लेकर गाजियाबाद के जंगलों में गया था...यानि अपह्मत होने वाला शख्स भी झूठ बोल रहा था...और इस तरह मुझे मामले में कई पेंच नजर आए...इस जानकारी के दिमाग में आने के बाद... मन ने कहा कि उस महिला की मदद करनी चाहिए...आखिर किसी इंसान को गलत तरीके से फंसाया जा रहा है..और मैं जानते हुए कैसे चुप रहूं..बस फिर क्या था मैंने अपनी टेप...यानि कैसेट खंगालनी शुरू की..लेकिन नहीं मिली..मजबूरन किसी और से कहना पड़ा और मैंने वो टेप सीडी में ट्रांसफर कर उन महिला को पकड़ा दी....जिसके बाद उसी सीडी के बिनाह पर पर कोर्ट से उन नामचीन शख्स को जमानत पर छोड़ दिया..उन्होंने इसके लिए मुझे इसके लिए जमकर धन्यवाद दिया...मैं घर आ गया...वो नामचीन इस बुढ़ापे में आज भी उस मामले में कोर्ट में केस लड़ रहे हैं....उनके साथ कभी ना खत्म होने वाली तारीखों का दौर जारी है..लेकिन मैं उस घटना के बाद से कई दिनों तक पुलिस की हकीकत पर बहुत नाराज था...लेकिन क्या करता...सिस्टम है यहां ना जाने कितने पुलिसवाले कितने मासूमों को फर्जी केस में अंदर कर देते हैं...शायद पैसे के लिए या फिर किसी और स्वार्थ के लिए...मैं नहीं जानता...उसके बाद कई मामलों में इस तरह की सच्चाई मेरे सामने आई लेकिन सिर्फ इस एक मामले के अलावा मैं किसी और में... कभी कुछ कर नहीं पाया....इसका मुझे आजतक मलाल है...आज मुझे अचानक ये बात याद आई सो मैंने सोचा कि अपने इस लेख के जरिए ही सही अपने इस मलाल को आपसे बांटकर कुछ कम करूं....हालांकि आप में से बहुत से लोग होंगे जो इस सच्चाई से रोजाना नहीं तो कभी ना कभी दो चार होते रहते होंगे।

Wednesday, November 18, 2009

आई अब आटे की बारी



आपकी थाली में पाई जाने वाली दाल के बाद अब दिल्ली सरकार का निशाना उसके साथ रखी रोटी पर है....महंगाई से राहत दिलाने की तथाकथित मुहिम में सस्ती दाल के बाद अब दिल्ली सरकार लोगों को सस्से आटे का झुनझुना दिखा रही है...यानि अब दाल के बाद आटे के जरिए पब्लिक को बेवकूफ बनाने की तैयारी है...जबकि हर नेता और राजनीतिज्ञ जानता है...कि पब्लिक सब जानती है...फिर भी आंकड़ों में खुद को बेहतर दिखाने के लिए जनता का दुख दर्द कम करने की मुहिम चलाई जा रही है..वो भी ऐसे समय में जब सस्ती दाल की हकीकत लोगों की थालियों तक पहुंच चुकी है..एक सौ बत्तीस सरकारी केंद्रो के जरिए दिल्ली सरकार लोगों को सस्ती दर पर...भले ही वो आम आदमी के लिए सस्ता ना हो....उपलब्ध कराएगी....दाम होगा एक सौ उनतालीस रुपये प्रति दस किलो.....खास बात ये है कि दिल्ली सरकार की मुखिया शीला दीक्षित ने इस बार दिल्लीवासियों को आ·ाासन दिया है....कि दाल की तरह आटे के बिक्री केंद्रों पर गड़बड़ी नहीं होगी..और लोगों को पूरी सहूलियत के साथ सही दाम पर आटा मिलेगा....लेकिन उनका ये दावा कितना पुख्ता है...ये तो आने वाले कुछ ही दिनों में आटे के बिक्री केंद्रों पर नुमाया हो ही जाएगा....और मान लीजिए अगर ये स्कीम फेल भी हो गई....तो जनता फिल्हाल क्या बिगाड़ लेगी सरकार का....क्योंकि दिल्ली सरकार में बैठे लोग जानते हैं कि फिलहाल कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता ...और इसीलिए फिलहाल वो लोग पूरी तरह से तल्लीन है सत्ता का सुख भोगने में...क्योंकि अब जनता को जो भी हिसाब लेना होगा...वो तो अगले विधानसभा चुनाव के समय ही हो पाएगा..ऐसे में जनता के ये प्रतिनिधि उस बात को सोच सोचकर क्यों अभी से अपना दिल जलाएं...रही बात जनता की तो ये तो इतिहास गवाह है...कि उसकी याददाश्त बेहत कमजोर होती है....चुनाव से ठीक छह महीने पहले कतरन लेकर शुरू हो जाएंगे....पैबंद लगाने के लिए.....जनता के दुखदर्द पर....तब तक तुम्हारी भी जय जय...हमारी भी जय जय

जलवायु परिवर्तन पर सकारात्मक रवैये की जरूरत



दुनिया का वातावरण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है....अगर समय रहते सभी इस गंभीर खतरे को लेकर ना चेते तो इसका सीधा खामियाजा सबसे पहले समुद्र तटीय इलाकों को उठाना पड़ेगा...वजह...ओजोन परत में छेद अगर और बढ़ा तो उन इलाकों में गर्मी बढ़ेगी...जहां सूर्य की रौशन बिना किसी रोकटोक के यानि ओजोन परत से बिना छने सीधे धरातल तक पहुंचेगी...जिसका तापमान दुनिया के बाकी के क्षेत्रों से ज्यादा होगा..नतीजतन वहां का जनजीवन तो प्रभावित होगा ही..साथ ही पूरी दुनिया इससे प्रभावित होगी...इस दिशा में कोपेनहेगेन में भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की प्रतिबद्धता वास्तव में सराहनीय है...जिन्होंने काफी लंबे समय के बाद भारत की ओर से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने की बात कही...उन्होंने कहा कि हालांकि भारत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों की सूची में पांचवे नंबर पर है...फिर भी उसे स्वैच्छिक कटौती जैसे कदम सत्रह साल पहले ही उठा लेने चाहिए थे...उन्होंने कहा कि हम इस में कटौती के लिए तैयार हैं...लेकिन हम विकसित देशों के मुकाबले प्रति व्यक्ति के आधार पर उत्सर्जन में कटौती करेंगे...प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए भी कानून बनाया जाएगा...और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए भी कठोर कानून बनाए जाएंगे...इसके अलावा आर्थिक विकास को इन गैसों के उत्सर्जन से जोड़ा जाएगा ...लेकिन ऐसी प्रतिबद्धता कई देश पहले ही दिखा चुके हैं...और हकीकत में ये मुहिम आज तक परवान नहीं चढ़ पाई है...ऐसे में जरूरत है सभी देशों को गंभीरता से सोचने और त्वरित निर्णय लेने की...ताकि दुनिया को ओजोन परत के क्षय से होने वाले संभावित खतरे से बचाया जा सके..उसको बचाने के लिए सही दिशा में कदम उठाए जा सकें...मौजूदा समय में भारत में प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन 1.2 टन है...जबकि अमेरिका और रूस जैसे देशों में ये आंकड़ा 20 से 22 टन है। जो अगले कई वर्षों में और बढ़ेगा...ऐसे में इस पर तुरंत सोचने की और अमलीजामा पहनाने की जरूरत है।

Tuesday, November 17, 2009

मैं महंगाई हूं

इन दिनों मेरी चर्चा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। चारों ओर, खेत खलिहान से लेकर घरों के दलान तक। शहर की गलियों से लेकर खेल के मैदान तक। हर तरफ मैं ही मैं हूं, दूसरा कोई नहीं। जब मैं अपने शबाब पर आती हूं तो देश की ज्यादातर आबादी को नानी याद आ जाती है। वे हाय हाय करते दिखाई देते हैं। फर्क नहीं पड़ता तो सिर्फ उनको जिनके पास अकूत दौलत है या फिर उनको जो सरकारी खजाने से अपना परिवार चलाते हैं।
जी हां, आपने बिलकुल ठीक समझा। मैं महंगाई हूं। इन दिनों पूरे देश में मेरा ही जलवा है। हर ओर मेरी ही चर्चा है। मैं सर्वत्र व्याप्त हूं। मैं कहीं भी पहुंच सकती हूं। और किसी पर भी काबिज हो सकती हूं। पिछले दिनों सब्जी के राजा कहे जाने वाले आलू को गुमान हो गया था कि उससे सस्ती कोई सब्जी नहीं, तो बस मैं उस पर काबिज हो गई। अब हाल देख लो। .... ऐसी ही कुछ सनक सिरफिरी दाल पर भी सवार हो गई थी, जिसे देखो वही कहता था- बस, दाल रोटी चल रही है। मैं ऐसा कब तक देख सकती थी। अगर देखती रहती तो मेरा वजूद ही खत्म हो जाता, बस मैं दाल पर सवार हो गई, अब बताओ कौन कहता है-‘दाल रोटी चल रही है।’ मैंने बच्चों को भी नहीं बख्शा। उनके दूध पर भी अपनी गिद्ध नजरें गड़ा दीं। अब गरीब माएं बच्चों को पानी मिलाकर दूध पिलाती हैं। मेरी खुद की आंखों में पानी भर आया। मुझे द्रोणाचार्य याद आ गए। किस तरह उन्होंने अश्वत्थामा को दूध की जगह आटे का घोल पिलाया था चीनी मिलाकर। लेकिन मैंने तो चीनी की मिठास में भी जहर घोल दिया है। आखिर, मुझे अपना वजूद बचाए रखना है। सरकारें तो अपना वजूद बचाने के लिए नरसंहार तक करवा देती हैं, न जाने कितनी मांओं की गोद सूनी करवा देती हैं। कितनी सुहागिनों को विधवा करवा देती हैं। इनके मुकाबले तो मैंने कुछ भी नहीं किया।
मैं कोने में गुमसुम पड़ी थी, चुपचाप। सब अपनी अपनी कर रहे थे। दिल्ली की सरकार आंखें मूंदे काॅमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में लगी थी, उसे भी मुझसे मतलब नहीं थी। सरकार में शामिल नेताओं, विपक्षी नेताओं को मेरे आने जाने से विशेष फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मुझे अपना वजूद बचाना था। इसलिए मैं हर दिन किसी न किसी जरूरी वस्तु पर सवार होती गई, यहां तक कि कम कमाने वाले लोगों के जीवन की गाड़ी करीब करीब पंचर हो गई, लेकिन ‘गरीबों की सरकार’ फिर भी नहीं चेती। बल्कि उसने और चीजों पर सवार करवा दिया। पहले बिजली के तारों पर सवारी करवाई, और बिजली के दाम बढ़ा दिए, फिर डीटीसी की नई नवेली बसों में सवारी करवा कर अपनी जेब गर्म की, और अब दिल्ली की पहचान बन चुकी मेट्रो में भी मुझे सवार कर दिया। लोग मेरी हाय-हाय कर रहे हैं। लेकिन कर कुछ भी नहीं रहे।
अकेले मैंने देश की सरकार गिरवा दी थी। वो भी सिर्फ प्याज पर सवार होकर। लेकिन पता नहीं, इस बार इन सरकारों को क्या हो गया है? सभी जानबूझ कर मुझे जरूरी चीजों पर सवार करा रहे हैं। विपक्षी नेता मेरे बहाने अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं, लेकिन उन्हें भी पता है, जब मेरे चढ़ते जाने के पीछे सरकार ही है तो कोई उसका और मेरा भी क्या बिगाड़ लेगा। अब किसी के पास रीढ़ नहीं बची है, सभी बिना रीढ़ वाले जीव की तरह रेंग रहे हैं। और जनता पिस रही है।
ये लेख राजन अग्रवाल के ब्लॉग अपना इलाका से साभार लिया गया है।

Sunday, November 15, 2009

मीडिया का बाल दिवस



चौदह नवंबर बाल दिवस, यानि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिवस...पूरी धूमधाम के साथ देशभर में मनाया गया....इस मौके पर स्कूलों में बच्चों की ओर से कई तरह के रंगारंग कार्यक्रम भी पेश किए गए....इन कार्यक्रमों को अभिभावकों ने खूब सराहा....जाहिर सी बात है, उनके बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं....खैर ये अच्छी बात है....इस खास मौके को भुनाने में मीडिया ने कोई कोरकसर बाकी नहीं छोड़ी...अखबार हो या फिर न्यूज चैनल, हर कोई नेहरू जी के बारे में और उनके प्रिय यानि बच्चों के बारे में कई तरह की खबरें दिखाने में होड़ लगाते दिखा...कहीं कोई भूखे नंगे बच्चों को विजुअल्स के जरिए परोसने की कोशिश में जुटा था...तो अखबार अपनी कलम की धार के जरिए भीख मांगते और चाय की दुकानों, होटलों और सड़क पर गंदगी में अपनी जरूरत का सामान तलाश करते बच्चों की कहानी को कागज पर उकेर कर परोस रहे थे....आखिर मीडिया है....समाज को सजग करने का काम इसके ही जिम्मे है....ऊपर से देश के जिम्मेदार नागरिक भी हैं..ये सभी मीडिया समाज के लोग...ऐसे में समाज की कुरीतियों को उजागर करना तो जरूरी हो ही जाता है...सो बालदिवस के खास मौके पर गरीब और असहाय बच्चों की स्टोरी दिखाकर उनके दुख दर्द दूर करने का बीड़ा उठाया....खूब दिखाई और लिखी गर्इं कहानियां...ऐसे बच्चों पर..और लोगों ने नाश्ते की टेबल पर,खाने के समय और शाम तक उन्हें खूब पढ़ा भी...उन्हें भी इन खबरों को पढ़कर ऐसे बच्चों पर दया आ गई...कि क्या इस तरह से भी बच्चे जिंदगी जीने को मजबूर हैं...खैर दस पांच मिनट सोचा...फिर अपने काम में जुट गए...भई याददाश्त है...कमजोर हो जाती है....तो उधर टीवी और अखबार वाले भी अगले दिन खुश नजर आए...किसी ने कहा खबर खूब बिकी...तो किसी ने कहा सर्कुलेशन बेहतर रहा...बस पूरा हो गया उन असहाय और दुखियारे बच्चों के नाम पर उठाया गया मीडिया का बीड़ा...क्या सिर्फ बालदिवस पर ही गरीब बच्चों के दुखदर्द उकेरने से उनके कष्ट दूर हो जाएंगे...क्या बाकी दिनों में मीडिया के जिम्मेदार लोगों की उन पर नजर नहीं पड़ती...क्या बाकी दिनों में उन पर खबरों से टीआरपी नहीं बढ़ेगी....या फिर बालदिवस को छोड़कर उन बच्चों की स्टोरी दिखाने या लिखने लायक नहीं रहती....शायद हर चीज का दिन होता है...इसी तरह बालदिवस इन बच्चों के नाम रहा...ऊपर से अब हर चीज तो बिजनेस बन गई है...सो ज्यादा सोचने की जरूरत भी नहीं है..लेकिन क्या यही है मीडिया की हकीकत...क्या इस पेशे को शुरू करने वालों ने कभी ऐसा सोचा था...क्या कुछ दिनों पहले पंचतत्व में विलीन हुए प्रभाष जी इसी मीडिया के पक्षधर थे...बालदिवस के दिन जब मैं खुद इस तरह के पैकेजेज लिखने में तल्लीन था...मेरे जेहन में कुछ ऐसे ही सवाल कौंध गए थे....ये सवाल मैं हर मीडियाकर्मी से पूछने से पहले खुद से भी पूछ चुका हूं....लेकिन जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है...उम्मीद करता हूं...इसके जवाब में आप कुछ बोलेंगे

कॉपियों का मूल्यांकन

शिक्षकों को देश के कर्णधारों का निर्माता माना जाता है...हमारी नई पौध को तराशकर उन्हें जिंदगी में अपने पैरों पर खड़े होने के लायक बनाने का काम शिक्षकों के जिम्मे होता है...और शायद इसीलिए शिक्षक का स्थान हर घर में आदरणीय होता है...माना जाता है...लेकिन आजकल बहुत से ऐसे शिक्षक हैं...जिन्होंने इस पेशे को गंदा करने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी है...इसी का ताजा उदाहरण मुझे हरियाणा के लोहारू में देखने के लिए मिला...जहां मेरे साथ काम करने वाले मेरे साथी प्रवींद्र...एक माध्यमिक स्कूल में चल रहे हरियाणा शिक्षा बोर्ड की परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन कार्य के बारे में जानकारी लेने पहुंचे थे...लेकिन वहां का नजारा देखकर वो हैरान रह गए...स्कूल के शिक्षक घर से कॉपियां लेकर आ रहे थे ...वो कॉपियां जो बोर्ड परीक्षा की थीं...वो कॉपियां जिन्हें घर ले जाना अवैध है....लेकिन वहां के ज्यादातर शिक्षक इस काम में लिप्त नजर आए...इन सभी बातों को लोगों के सामने लाने के लिए प्रवींद्र ने ये जानकारियां अपने कैमरे में साक्ष्य के तौर पर बटोरी....इतना ही नहीं कुछ ऐसे भी शिक्षक वहां नजर आए...जो इस मूल्यांकन कार्य के योग्य ही नहीं थे..यानि ना तो वो कहीं पढ़ाते थे...और ना ही उनके पास इसके लिए आवश्यक डिग्री....लेकिन वो मूल्यांकन कर रहे थे...जब प्रवींद्र ने उनसे बात करनी चाही तो वो भाग खड़े हुए...इतना ही नहीं शिक्षकों ने नाम ना लेने की शर्त पर यहां तक बताया कि बहुत से शिक्षक ऐसे हैं...जो अपने घर में अपने बच्चों से कॉपियों का मूल्याकन कराते हैं ...खैर यहां तक भी ठीक था...लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जिनके घर पर कॉपियों को ठीक कराने वालों की भीड़ भी जुटती है....जिसका मतलब आप बखूबी समझते हैं...यानि विद्यार्थियों के साथ क्या कुछ चल रहा है...और उनके भविष्य के साथ कैसा खिलवाड़ हो रहा है....ये आप समझ सकते हैं...इसमें उन हीरो टाइप छात्रों की तो चांदी हो जाती है...जो साल भर सिर्फ मटरगश्ती करते हैं....लेकिन बेचारे मारे वो जाते हैं जो पूरी साल अपनी आखें कमजोर कर परीक्षा देते हैं...ऐसे मूल्यांकन का नतीजा ये होता है...कि असल विद्यार्थी गलत मूल्यांकन का शिकार हो जाते हैं ...और जो ना पढ़ने वाले हैं ...वो जोर और सिफारिश का पूरा इस्तेमाल कर वाहवाही के हकदार बन जाते है....इससे अच्छी मेधा वाले बच्चों में विकार पैदा होता है...ऐसे में मेरे जहन में ये सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसी चीज बची है...जिसमें मोलभाव नहीं होता है...जिसमें धांधली नहीं है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं है....लेकिन ऐसे सवालों के जवाब के लिए हम सभी को आवाज उठानी पड़ेगी ...बोलना पड़ेगा

Saturday, November 14, 2009

बीस का योद्धा.

क्रिकेट की दुनिया में रिकॉड्र्स को अपना गुलाम बनाने वाले मास्टर ब्लास्टर के कदमों पर हर युवा चलना चाहता है. मगर क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर जिस तरह से उम्मीदों के इस दबाव पर खरे उतरें हैं... वो शायद हर किसी के बूते की बात नहीं. तभी तो कहते हैं कि सचिन आज भी वैसे हैं जैसे कल थे. महज पंद्रह साल की उम्र में देश की देसी लीग रणजी ट्रॉफी से अपना सफर शुरु करने वाले इस महान बल्लेबाज ने शतक जड़कर क्रिकेट के रणनीतिकारों को अपना परिचय दिया. देवधार और दिलीप ट्रॉफी में भी शतक से आगाज करने वाले सच्चू ने फिर भारतीय टीम में दस्तक दे दी. इसके बाद रनों की गंगा ऐसी बही कि आज सभी यही कह रहे हैं कि सोलह साल के सच्चू और छत्तीस साल के मास्टर ब्लास्टर के कद की कोई हद नहीं लेकिन जमीन से जुड़ाव बीस साल पुराना ही नजर आता है. पंद्रह नवंबर उन्नीस सौ नवासी में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के खिलाफ जब मास्टर ब्लास्टर ने चौका जड़कर अपने इंटरनेश्नल क्रिकेट करियर का आगाज किया तो किसी के जेहन में ये नहीं था कि साल दो हजार में नौ में भी ये मराठा नॉट आउट पारी खेलता नजर आएगा... हिन्दुस्तान में बीस साल में सात प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं लेकिन रनों के एवरेस्ट पर सवार मास्टर ब्लास्टर का कोई विकल्प अभी तक तैयार नहीं हुआ. कहते हैं ना.... भगवान बदलते नहीं... और क्रिकेट का भगवान भी इसी फलसफे की एक बानगी है......हमें नाज है अपने हीरो पर .....जिसने हिंदुस्तान में क्रिकेट की परिभाषा को बदल कर रख दिया...या यूं कहें कि जिसकी बदौलत आज क्रिकेट हिंदुस्तान में खेला नहीं जाता....बल्कि पूजा जाता है...

तहजीब

उड़ानों के लिए खुद को बहुत तय्यार करता है
ज़मी पर है मगर वो आसमां से प्यार करता है

ये कैसा दौर है इस दौर की तहजीब कैसी है
जिसे भी देखिये वो पीठ पर ही वार करता है

गुज़र जाते हैं बाकी दिन हमारे बदहवासी में
ज़रा सी गुफ्तगू कुछ देर बस इतवार करता है

तुम्हारे आंसुओं को देखना मोती कहेगा वो
सियासतदान है वो दर्द का व्यापार करता है

हवस के दौर में बेकार हैं अब प्यार के किस्से
घडा लेकर भला अब कौन दरिया पार करता है

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Friday, November 13, 2009

बाल दिवस की हकीकत.....

कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने कभी लिखा था.....वह तोड़ती पत्थर, इलाहाबाद के पथ पर। आज इस बच्चे को देख कर हम कह सकते हैं.....वह तोड़ता पत्थर, पटियाला के पथ पर। इलाहाबाद हो, चाहे पटियाला....आज बाल मजदूरी की दर बढ़ती ही जा रही है। किसी को कूड़ा इकट्ठा करना पड़ता है....कोई दो वक्त की रोटी के लिए अपने जीवन को बदरंग कर दूसरों के लिए रंगीन गुब्बारे लिए घूमता है। बड़ी संख्या में बच्चे जूठे बर्तन धोने के लिए भी मजबूर हैं। क्या चाय की दुकान, क्या होटल और क्या घर...सभी जगह बचपन काम के बोझ के तले दबा नजर आ रहा है। ऐसे में जब हम बाल दिवस मना रहे हैं......कैसे उम्मीद करें कि देश के सभी बच्चे....अपने चाचा नेहरू के सपने को पूरा कर सकेंगे। सरकारी और स्वयंसेवी संगठन लाखों रूपये खर्चकर बाल मजदूरी रोकने और बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने का दावा भले ही करते हों...लेकिन हकीकत सड़कों पर साफ देखी जा सकती है। बाल मजदूरी को रोकने और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों के पास जाओ तो वो इस बारे में बनाए गए सरकारी कानून के बारे में तफशील से जानकारी देने के लिए सीना चौड़ा कर तैयार हो जाते हैं....लेकिन जब बात उनके विभाग की ओर से उठाए गए ठोस कदमों के बारे में करें...तो कहीं बात कहीं और अटकाने की कोशिश में जुटे नजर आते हैं....कमोबेश यही नजारा हर जगह देखने को मिल जाता है ....।हमारे बीच से बच्चों के चाचा नेहरू को गये...... पैंतालीस साल हो गये हैं। फिर भी आज भी लाखों बच्चों के सपने अधूरे हैं और जिनके पूरे होने के कोई आसार भी नजर नहीं आ रहे....ऐसे में कोई भरोसा करना भी चाहे कि देश में सभी बच्चों को समान विकास के लिए सुविधाएं मिलेंगी....तो भला कैसे...क्या उम्मीद की कोई किरण कहीं नजर आ रही है...जवाब होगा....फिलहाल तो ओझल है.....हां ये जरूर है कि इनमें से बहुत से सपने सरकारी फाइलों में जरूर पूरे किए जा चुके र्हैं। सबकुछ जानते हैं हम लेकिन फिर भी ना कुछ करना चाहते हैं और ना ही आवाज उठाना चाहते हैं...क्या यही हमारी असलियत है...जरा आप भी खुद से पूछ कर देखिए...हकीकत से दो चार हो जाएंगे।...उसके बावजूद अगर बोलने का माद्दा रखते हैं..तो यहां बोलिए....